न्यूजीलैंड
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अपनी बात
यात्रा साहित्य के विशाल नील गगन में माला वर्मा एक जाना-पहचाना और बेहद सम्मानित नाम है। उन्होंने अपने जीवंत अनुभवों से यात्रा साहित्य को एक नई ऊंचाई दी है। जब मेरी दृष्टि उनके समृद्ध यात्रा-साहित्य पर गई, तो मैं कुछ समय के लिए ठिठक कर उनकी इस अद्भुत साधना को निहारता रह गया। उन्होंने अपनी घुमक्कड़ी और लेखनी के बेजोड़ तालमेल से यात्रा साहित्य के भंडार में 28 उत्कृष्ट पुस्तकों की एक अनमोल पूंजी जोड़ी है। सबसे सुखद बात यह है कि शब्दों और दृश्यों का यह सफर अभी थमा नहीं है।
हाल ही में जब उनकी 29वीं सद्य-प्रकाशित पुस्तक “न्यूजीलैंड” मेरे हाथों में आई, तो मन एक सुखद अहसास से भर गया। दिल को यह सोचकर बड़ी तसल्ली हुई कि समय और उम्र के इस पड़ाव पर भी लेखिका ने अपनी यात्राओं और उनके वृतांतों को थमने नहीं दिया है। लेखिका के जीवन का लंबा अनुभव और उनकी लेखनी की यह अनवरत निरंतरता, आज की पीढ़ी के युवा पाठकों और लेखकों में एक नई ऊर्जा और उमंग का संचार करती है।
उनकी इस नई कृति की शुरुआत भी बेहद स्वाभाविक और आत्मीय है। पुस्तक में यात्रा की भूमिका उनके अपने घर से शुरू होकर कोलकाता एयरपोर्ट तक पहुंचती है, और फिर पाठक उनके साथ उस सपनों के देश की ओर उड़ान भरता है, जिसकी कल्पना उन्होंने अपने मन में संजो रखी थी। माला जी की सबसे बड़ी विशेषता उनका कमाल का वर्णन-शैली है। उनकी पुस्तकों के पन्नों से गुजरते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो खुद लेखिका का हाथ थामे उस सफर में कदम-से-कदम मिलाकर साथ चल रहे हैं।
उनकी भाषा में एक ऐसा जादू है जो मन पर इस कदर हावी हो जाता है कि पाठक घर बैठे-बैठे ही सुदूर विदेश की वादियों का आनंद ले लेता है। यह उनके शब्द-शिल्प का ही करिश्मा है कि जैसे ही आप पुस्तक पढ़ना शुरू करते हैं, आपका मन पलक झपकते ही एक बिल्कुल अलग और खूबसूरत दुनिया में विचरण करने लगता है। “न्यूजीलैंड” के रूप में सामने आया उनका यह नया यात्रा-वृतांत भी इसी जादू का एक साक्षात प्रमाण है, जो बांधे रखता है और अंत तक साथ चलने के लिए विवश करता है।
प्रशांत महासागर के सुदूर दक्षिण-पश्चिम में स्थित न्यूजीलैंड, जिसे माओरी भाषा में ‘एओटेरोआ’ अर्थात् ‘लंबे सफेद बादलों की भूमि’ कहा जाता है, प्रकृति का एक जादुई और अविस्मरणीय उपहार है। भौगोलिक दृष्टि से यह 13वीं शताब्दी में इंसानों द्वारा बसाया गया दुनिया का अंतिम प्रमुख भूभाग था, जहां पूर्वी पोलिनेशिया से आए साहसी नाविकों ने कदम रखा और यहां की मूल ‘माओरी संस्कृति’ की नींव रखकर इस धरती को अपने अनूठे तौर-तरीकों से सजाया-संवारा। इसके बाद सन् 1642 में डच खोजकर्ता एबेल तस्मान ने इस भूमि को दुनिया के सामने उजागर किया और सन् 1769 में ब्रिटिश कैप्टन जेम्स कुक ने इसके तटों का सटीक मानचित्रण किया। कोलकाता से सिंगापुर होते हुए क्राइस्टचर्च तक की यह यात्रा एक नई और अछूती दुनिया के द्वार खोल देती है। यह एक ऐसा अद्भुत देश है जो अपनी बेदाग स्वच्छता, आधुनिकता, फेफड़ों को सुकून देने वाली प्रचुर ऑक्सीजन और मखमली हरियाली के लिए जाना जाता है, जहां पर्यावरण की रक्षा के लिए सख्त नियम लागू हैं और स्थानीय नागरिकों के साथ-साथ पर्यटक भी इसकी पवित्रता को लेकर बेहद सतर्क रहते हैं। इस देश की पहचान इसके शर्मीले, रात में निकलने वाले और उड़ानहीन राष्ट्रीय पक्षी ‘कीवी’ से जुड़ी है कि यहां के मूल निवासियों को भी दुनिया भर में प्यार से ‘कीवी’ कहा जाता है। यह देश कई मायनों में अनूठा और रोचक है। लेखिका के अनुसार यहां इंसानों की तुलना में भेड़ों की आबादी कहीं अधिक है जो इसके विशाल चरागाहों की रीढ़ हैं। इसके साथ ही, यह समाज ऐतिहासिक रूप से बेहद प्रगतिशील रहा है, जिसने सन् 1893 में दुनिया में सबसे पहले महिलाओं को सार्वभौमिक रूप से वोट देने का अधिकार देकर समानता की एक नई मिसाल पेश की थी। प्राचीन माओरी परंपराओं, अद्वितीय वन्यजीवों और आधुनिक जीवनशैली का यह संगम हर यात्री के मन में एक अमिट छाप छोड़ जाता है।
प्राचीन माओरी परंपराओं, अद्वितीय वन्यजीवों और आधुनिक जीवनशैली के इस विहंगम संगम को अपने अनूठे संस्मरण में पिरोने के लिए आदरणीय लेखिका माला वर्मा जी को उनकी इस 29वीं कृति “न्यूजीलैंड” के शानदार प्रकाशन पर हार्दिक बधाई और अनंत शुभकामनाएं! समय और उम्र के इस पड़ाव पर भी बिना थके, नए देशों को अपनी लेखनी में समेटने का उनका यह जज्बा वाकई अद्भुत है। इतिहास के गर्त को टटोलने और समाज के उस प्रगतिशील पहलू को जैसे महिलाओं के मताधिकार का गौरवशाली इतिहास अपने पाठकों के सामने लाने के लिए उनकी वैचारिक प्रगतिशीलता को कोटि-कोटि साधुवाद। उनकी यह साहित्यिक यात्रा अनवरत चलती रहे और हमें यूँ ही घर बैठे दुनिया की सैर कराती रहे, यही मंगल कामना है।
– डॉ. अजय चौधरी
एसोसियट प्रोफेसर
8981031969
ajaychoudharyac@gmail.com
| Weight | 295 g |
|---|---|
| Dimensions | 21 × 14 × 2 cm |
‘न्यूज़ीलैंड’ अपने आप में एक बहुत सुंदर, रोमांचक देश है। एक पूरे देश को चंद दिनों में देखना संभव नहीं है फिर भी जो देखा, जितना देखा वो अविस्मरणीय है। यह प्रशांत महासागर के दक्षिण–पश्चिम में स्थित एक देश है जिसे ‘एओटेरोआ’ यानी ‘लंबे सफेद बादलों की भूमि’ कहा जाता है। यह एक माओरी शब्द है और यही माओरी जनजाति यहां के मूल निवासी थे जिन्होंने अपने तरीके से इस धरती को सजाया– संवारा। एक लंबा इतिहास है जिसकी विस्तार से चर्चा मैंने इस यात्रा वृतांत में दी है। यह 13 वीं शताब्दी में इंसानों द्वारा बसाया गया अंतिम प्रमुख भूभाग था जो अपनी अनोखी माओरी संस्कृति, शानदार खूबसूरत नजारों और कीवी पक्षी के लिए जाना जाता है। यहां के लोगों को ‘कीवी’ भी कहा जाता है। कीवी यहां का राष्ट्रीय पक्षी है किंतु बेचारा उड़ नहीं सकता– सो सैड।
कोलकाता से सिंगापुर की यात्रा हुई। सिंगापुर को भर नजर देखा जबकि सिंगापुर मेरा पहले भी घूमा हुआ है, पुरानी यादें ताजा हुई और फिर वहां से क्राइस्ट चर्च (न्यूजीलैंड) के लिए हमने उड़ान भरी। इसके बाद तो हम थे और न्यूजीलैंड की अनोखी सुंदर धरती। इतना साफ–सुथरा, हरा–भरा, ऑक्सीजन से लबालब भरा कोई देश भी हो सकता है! हमें खूब-खूब चेतावनी दी गई थी जाने के पूर्व, कि उस देश को तनिक गंदा नहीं करना है, हमने सावधानी बरती। जहां-जहां हमारे कदम पड़े वहां की स्वच्छता, आधुनिकता, प्राकृतिक सुंदरता देख हम दंग थे। यहां के स्थानीय लोग भी बहुत अच्छे हैं।
एक ऐसा देश जहां इंसानों से ज्यादा भेड़ पाई जाती हैं। सन् 1893 में दुनिया में सर्वप्रथम न्यूजीलैंड ने महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया। कई–कई रोचक बातें हैं जिनका उल्लेख मैंने इस यात्रा संस्मरण की किताब में पूरे विस्तार से दिया है। जहां सन् 1642 में डच खोजकर्ता एबेल तस्मान ने इस धरती को खोजा तो वहीं सन् 1769 में ब्रिटिश खोजकर्ता जेम्स कुक ने इसके तटों का मानचित्रण किया। न्यूजीलैंड के खूबसूरत स्थानों के साथ-साथ हमने यहां की प्राचीन माओरी संस्कृति के बारे में भी विस्तार से जाना।
खैर, इस पुस्तक को पढ़िए और मेरी नजर से एक बेमिसाल देश ‘न्यूज़ीलैंड’ को जानिए, परखिए। चाहे तो न्यूजीलैंड का एक प्लान बना लीजिए। वैसे यह भी सत्य है कि एक पूरे देश को चंद पन्नों में समेटना संभव नहीं है। फिर भी मैंने जो देखा, अनुभव किया उसकी चर्चा की है। उम्मीद है किताब आपको पसंद आएगी। न्यूजीलैंड में भारतीयों के अच्छी खासी तादाद बसर करती है। वहां नहीं जाती तो पता भी ना चलता!
ग्रुप के सभी सहयात्रियों का दिल से आभार जिनकी वजह से यह यात्रा बेहद रोचक और यादगार बन गई थी। बिना ग्रुप में निकले किसी यात्रा का आनंद नहीं है। मेरा तो अब तक का यही अनुभव है।
अंजनी प्रकाशन के नंदलाल जी और उनके टीम का धन्यवाद जिनकी वजह से मेरी किताबें आराम से प्रकाशित होती हैं। सबका आभार प्रकट करती हूं…
माला वर्मा
अगस्त, 2026



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