रूस-मंगोलिया-चीन – पुस्तक का आवरण
यात्रा-वृत्तांत · Travelogue

रूस-मंगोलिया-चीन

लेखक: माला वर्मा

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पुस्तक के बारे में — About the book

यूं तो पूरी किताब ही मेरे लिए ‘अपनी बात’है। इस एक यात्रा में ‘तीन’ महत्वपूर्ण देशों की यात्रा संपन्न हुई। वैसे यह भी सच है महज पंद्रह–बीस दिनों के भीतर तीन देशों को देखना संभव नहीं है इसके लिए ढेरों दिन चाहिए लेकिन हमारे साथ समय की बाध्यता थी और कम वक्त में हमने जो भी देखा, हमारे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। इसलिए जो भी, जितना भी हमारे हाथ में आया हमने उसका भरपूर उपयोग किया। ‘जो प्राप्त है वह पर्याप्त है’ वाली सोच पर अमल करते हुए हमने हर क्षण का आनंद लिया। भरसक मेरे सामने जो आता गया उसके इतिहास–भूगोल को आत्मसात करते रही और वाकई मैं अभिभूत थी इतना कुछ एक संग पाकर जिसे मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। यह जागती आंखों का सपना था जो पूरा हुआ।
रूस को देखने का प्लान कई–कई बार हुआ, कैंसिल हुआ और बात फाइनल तक पहुंची। ‘रूस’ देश में दो–तीन दिनों के अंतराल में जो भी देखा वो अचंभित करने वाला था। सेंट पीटर्सबर्ग, मॉस्को को निहार दंग थी। कोई स्थान इतना सुंदर कैसे हो सकता है! रूस के साथ कुछ भावनात्मक जुड़ाव भी था। मेरे प्रिय फिल्मी कलाकार राज कपूर जी जिन्होंने अपनी फिल्मों से, मधुर गीत–संगीत से कभी रूसी लोगों पर एकछत्र राज किया था। भले बाद में अन्य कई कलाकार इस रूसी धरती पर मशहूर हुए लेकिन राज कपूर जी ने जो छाप छोड़ी वो अभेद्य था।
उसके बाद ‘साइबेरिया’ क्षेत्र था ‘लेक बैकाल’ की विराटता थी। यह सारे नाम बचपन से पढ़ती–सुनती आई थी। दिल–दिमाग के किसी कोने में उसकी अमिट छाप थी और इस यात्रा में एकदम से उसे देखने का मौका मिला। ‘ट्रांस साइबेरियन एक्सप्रेस’ दुनिया की सबसे लंबी रेल यात्रा, खूब नाम सुना था जिसका अनुभव भी मिला। साथ ही ‘ट्रांस मंगोलियन ट्रेन’ यात्रा भी हुई।
‘रूस’ के बाद ‘मंगोलिया’ देश जहां की धरती पर महामानव चंगेज खान ने जन्म लिया और इतिहास के पन्नों पर हमेशा के लिए अमर हो गए। तो वहीं गोबी रेगिस्तान को कोई कैसे भूल सकता है जो नाम भर के लिए मरुस्थल बना है लेकिन वहां जाकर देखिये तो पता चलेगा वो स्थान पहाड़, नदियों, हरियाली, झरनों से भरा हुआ है। बचपन में जो पढ़ा था वो तो कुछ भी नहीं जो यहां आकर देखा/सुना। साइबेरिया, गोबी,लेक बैकाल, चंगेज खान आदि– आदि के बारे में जो जानकारी मिली, अनुभव हुआ वह अविस्मरणीय है। अपनी यात्रा वृतांत में मैंने भरसक कोशिश की है कि पूरा विस्तार दे पाऊं लेकिन इन जगहों की विशालता को कुछ पन्नों में समेटना सूरज को दीया दिखाने तुल्य है।
और अंत में तीसरा ‘चीन देश’ इस चीन देश को मैंने 18 वर्ष पहले भी देखा था और कभी सपने में भी नहीं सोचा कि दोबारा यहां कदम रखूंगी! जब चीन देश में आ गई तो ‘चीन की दीवार’ पर भी चढ़ना था। विश्व प्रसिद्ध दुनिया के सात अजूबों में शामिल चीन की दीवार पर दोबारा चढ़ने का सौभाग्य कितनों को मिलता है! ‘माओ त्से तुंग’ ने कभी कहा था, ‘वह पुरुष,पुरुष नहीं जो कभी ग्रेट वॉल पर नहीं चढ़ा’ उनका इशारा तो अपने देशवासियों की तरफ था मगर आज के इस खुलेपन के जमाने में यह संदेश पूरी दुनिया को जाता है। चीन की दीवार पर चढ़ने का मौका सबको नहीं मिल सकता मगर इसके बारे में विस्तृत जानकारी लेकर भी मन को सुखद अनुभूति दी जा सकती है। माओ त्से तुंग ने यहां सिर्फ ‘पुरुष जाति’ को क्यों लपेटे में लिया? क्या पुरुष के साथ कोई महिला नहीं चढ़ सकती थी? यानी चीन की दीवार पर चढ़ना सिर्फ पुरुषों के लिए गौरव– मेहनत वाला कार्य था!
पिछली यात्रा में मैंने चीन देश को बहुत विस्तार से देखा था। इस बार सिर्फ बीजिंग को देखना हुआ। चीन की दीवार को पुनः देखना भी विस्मयकारी था। ‘रूस–मंगोलिया–चीन’ इन तीन देशों की यात्रा करके कितनी खुशी, तसल्ली, सुकून मिला इसकी तुलना नहीं। चीन को दो बार देखा लेकिन मन कहां भरा! तो क्या तीसरी बार चीन की यात्रा करनी होगी!
इन तीन देशों का दर्शन करके मैंने अपने आप को और ज्यादा समृद्ध किया। वापसी में बैंकॉक एयरपोर्ट से कोलकाता। यानी एक और देश ‘थाईलैंड’ फ्री में जुड़ गया। यात्रा संस्मरण की एक किताब ‘चीन देश’ पर पहले भी आ चुकी है, इस बार ‘रूस–मंगोलिया–चीन’ को एक संग समेट नई किताब की तैयारी है। अगर आप देश–दुनिया घूमने, उसके बारे में जानने की इच्छा रखते हैं तो इस यात्रा संस्मरण को जरुर पढ़िए। भरसक इन देशों से जुड़े ऐतिहासिक और भौगोलिक तथ्यों को मैंने विस्तार से लिखा है। इस यात्रा में मेरे साथ जो भी सहयात्री जुड़े थे, सब का दिल से आभार। उन यादगार पलों की झांकी, कुछ महत्वपूर्ण तस्वीरें इस किताब के अंतिम चंद पृष्ठों पर दी गई हैं। अंजनी प्रकाशन का अशेष धन्यवाद जिनके माध्यम से एक महती किताब का निर्माण हुआ।
माला वर्मा

भूमिका / अपनी बात पढ़ें
यात्रा के बहाने जीवन का विस्तार – एक संवेदनशील संस्मरण यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि मन, दृष्टि और अनुभवों का विस्तार होती है। माला वर्मा जी की पुस्तक “रूस-मंगोलिया-चीन”– यात्रा संस्मरण इसी विस्तार की एक सजीव और आत्मीय अभिव्यक्ति है। यह कृति मात्र एक यात्रा-वृत्तांत नहीं, बल्कि एक संवेदनशील मन की अनुभूतियों, संघर्षों, आशंकाओं और उत्साह का जीवंत दस्तावेज है। पुस्तक की शुरुआत से ही पाठक लेखक के साथ एक भावनात्मक यात्रा पर निकल पड़ता है। रूस जाने की बार-बार बनती और टूटती योजनाएँ, कोविड काल की अनिश्चितता, और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों – विशेषतः रूस-यूक्रेन युद्ध – का प्रभाव, इस संस्मरण को केवल भौगोलिक यात्रा नहीं रहने देते, बल्कि इसे समय और परिस्थितियों का भी साक्षी बना देते हैं। लेखिका ने जिस सहजता से अपने मन के द्वंद्व – डर और उत्साह – को अभिव्यक्त किया है, वह पाठकों को गहराई से जोड़ता है।c इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी ईमानदारी और आत्मीयता है। लेखिका अपने अनुभवों को किसी बनावटीपन के बिना प्रस्तुत करती हैं। कभी एक माँ की चिंता, कभी एक यात्री का उत्साह, तो कभी एक संवेदनशील नागरिक का युद्ध के प्रति आक्रोश – ये सभी भाव एक साथ इस पुस्तक में प्रवाहित होते हैं। विशेष रूप से युद्ध की पृष्ठभूमि में आम लोगों की पीड़ा के प्रति लेखिका की संवेदना, पाठक के मन को छू जाती है। भाषा की दृष्टि से यह पुस्तक अत्यंत सहज, प्रवाहमयी और संवादात्मक है। ऐसा लगता है मानो लेखिका सामने बैठकर अपनी यात्रा सुना रही हों। छोटे-छोटे प्रसंग, जैसे – फ्लाइट छूटने की कल्पना, यात्रा की तैयारियाँ, साथियों के साथ संवाद – इन सबका चित्रण इतना जीवंत है कि पाठक स्वयं को उस यात्रा का हिस्सा महसूस करने लगता है। माला वर्मा जी की लेखनी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है उनका सकारात्मक दृष्टिकोण। अनेक बाधाओं – युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं, स्वास्थ्य समस्याओं – के बावजूद उनका यात्रा के प्रति उत्साह कम नहीं होता। “जो किस्मत में लिखा होगा वही होगा” जैसी सोच, इस संस्मरण को प्रेरणादायक भी बना देती है। यह केवल एक यात्रा की कहानी नहीं, बल्कि जीवन को खुले मन से जीने का संदेश भी देती है। पुस्तक में रूस, मंगोलिया और चीन जैसे विविध सांस्कृतिक और भौगोलिक परिवेशों का उल्लेख आने वाले भागों के लिए एक गहरी उत्सुकता पैदा करता है। ट्रांस-साइबेरियन रेल यात्रा, गोबी रेगिस्तान, बैकाल झील जैसे स्थलों का उल्लेख पाठक के भीतर रोमांच जगाता है और यह संकेत देता है कि आगे की यात्रा कितनी अद्भुत होने वाली है। समीक्षा के दृष्टिकोण से देखें तो यह कृति हिंदी यात्रा-साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान है। आज के समय में जब यात्रा-वृत्तांत अक्सर केवल सूचनात्मक या औपचारिक बनकर रह जाते हैं, माला वर्मा जी की यह पुस्तक अपने भावनात्मक गहराई और व्यक्तिगत स्पर्श के कारण अलग पहचान बनाती है। अंततः, “रूस, मंगोलिया, चीन – यात्रा संस्मरण” एक ऐसी कृति है जो पाठकों को न केवल दूर देशों की सैर कराती है, बल्कि उन्हें अपने भीतर झाँकने का अवसर भी देती है। यह पुस्तक उन सभी के लिए प्रेरणास्रोत है जो जीवन में कुछ नया देखने, समझने और अनुभव करने का साहस रखते हैं। शिव पूजन साव प्रबंधक, अंजनी प्रकाशन

विवरण — Book details

ISBN
978-93-94667-84-6
Language · भाषा
Hindi
Binding · बाइंडिंग
Paperback
Publisher · प्रकाशक
Anjani Prakashan
Size · आकार
21 × 14 × 2 cm
Weight · वज़न
508 g
Genre · विधा
यात्रा-वृत्तांत (Travelogue)

लेखक के बारे में — About the author

माला वर्मा Mala Verma 48 books · यात्रा-वृत्तांत

यात्रा साहित्य की जानी-मानी लेखिका, जिनकी लेखनी पाठकों को दुनिया के कोने-कोने की सैर कराती है।

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